आधुनिकता की दौड़ में परंपराएं धूमिल होती जा रही हैं। ये परंपराएं अतीत बनती जा रही हैं मगर अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जो परंपराओं को जिंदा रखने की कोशिश में लगे हैं। उनमें सांसें डालने का प्रयास कर रहे हैं ताकि युवा व आने वाली पीढ़ी इन परंपराओं को याद रखे, इनका महत्व समझे। इनमें से ही एक परंपरा ढोलरू गीत है जिसे चैत्र माह में घर-घर जाकर सुनाया जाता है।

ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले इस गाने को घुमंतू टोली (ढोलरू वाले) हर घर की दहलीज पर जाकर गा रहे हैं। आठ दिन तक इन घुमंतू टोलियों की ओर से गाए जाने वाले ढोलरू गीत को शुभ मानते हुए लोग भी बड़े चाव से गीत को सुनने के बाद टोलियों को अनाज, कपड़े, वस्त्र, मिठाई व पैसे भेंट करते हैं। सदियों से यह मान्यता है कि चैत्र महीने के नजदीक होने पर उसका नाम तब तक नहीं नहीं लेना, जब तक ढोलरू वाले घर आकर इस महीने का नाम न सुना दें। संक्रांति से लेकर आठ दिन तक ढोलरू वाले ढोलक बजाकर चैत्र का नाम गायन के माध्यम से सुनाते हैं। भले ही अलग-अगल टोलियों और व्यक्तियों की ओर से ढोलरू का गीत भी अलग-अलग शैली में गाया जाता हो लेकिन इसका अर्थ एक ही है। दुनिया बनाने वाले भगवान, ईश्वर, दुनिया दिखाने वाले माता-पिता व दुनिया का ज्ञान देने वाले गुरुओं का नाम पहले लो और उसके बाद बाकी नाम लो।

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